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माँ काली को समर्पित ‘कालीमठ ‘मंदिर

देवभूमि उत्तराखंड एक ऐसा राज्य है जो अपनी धार्मिक , सनातन , सांस्कृतिक सभ्यताओं के लिए विख्यात हैं। जहां के कण-कण में देवी-देवताओं का वास है। पंच बद्री, पंच केदार और पंच प्रयाग भी यहां स्थिति है। यहां के गोमुख से निकलती मां गंगा सबके पापो को धोती हुई निर्मलता से बहती है। उत्तराखंड में कई प्रसिद्ध शक्तिपीठ भी विधमान है जिनकी ख्याति दूर दूर तक फैली है। ऐसे शक्तिपीठ जिनके दर्शन मात्र सारे कष्ट दूर हो जाते है।

एक ऐसा ही शक्तिपीठ देवभूमि उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले के केदारनाथ की चोटियों से घिरा हिमालय में सरस्वती नदी के किनारे बसा है। जो कि प्रसिद्ध शक्ति सिद्धपीठ श्री कालीमठ मंदिर के नाम से विख्यात है। पर्वतों की गौद में बसा यह मंदिर समुन्द्रतल से 1463 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।

यहां पाए जाते है देवी काली के पैरों के निशान

बता दें कि कालीमठ मंदिर रुद्रप्रयाग जिले के प्रमुख पर्यटक स्थलों में से एक है। साथ ही इस मंदिर को भारत के प्रमुख सिद्ध शक्ति पीठों में से एक माना जाता है। स्कन्दपुराण के अंतर्गत केदारनाथ के 62 अध्धाय में मां काली के इस मंदिर का वर्णन पाया जाता है। कालीमठ मंदिर से 8 किलोमीटर की खड़ी ऊंचाई पर स्थित दिव्य चट्टान को ‘काली शिला’ के रूप में जाना जाता है, जहां देवी काली के पैरों के निशान मौजूद हैं और कालीशीला के बारे में यह विश्वास है कि मां दुर्गा ने शुम्भ, निशुम्भ और रक्तबीज दानव का वध करने के लिए कालीशीला में 12 वर्ष की बालिका के रूप में प्रकट हुयी थी।

कालीशीला में देवी देवता के 64 यन्त्र है, मां दुर्गा को इन्ही 64 यंत्रो से शक्ति मिली थी। कहा जाता है कि इस स्थान पर 64 योगनिया विचरण करती रहती हैं। साथ ही यह भी माना जाता है कि इस स्थान पर शुंभ-निशुंभ दैत्यों से परेशान देवी-देवताओं ने मां भगवती की तपस्या की थी। जिसके बाद मां प्रकट हुई और असुरों के आतंक के बारे में सुनकर मां का शरीर क्रोध से काला पड़ गया और उन्होंने विकराल रूप धारण कर युद्ध में दोनों दैत्यों का संहार कर दिया। बताते है कि उन्हें शांत करवाने के किये भगवान शिव उनके चरणों मे लेट गए थे।जैसे ही मां काली ने भगवान शिवजी के सीने में पैर रखा, तो मां काली का क्रोध शांत हो गया। आज भी मां काली के पैरों के निशान यहां पर पाएं जाए है।

मंदिर में कोई मूर्ति नही

कालीमठ मंदिर के बारे में सबसे रोचक बात यह है कि इसमें कोई मूर्ति नहीं है, मंदिर के अन्दर भक्त कुंडी की पूजा करते है, यह कुंड रजतपट श्री यन्त्र से ढका रहता है । केवल पूरे वर्ष में शारदे नवरात्री में अष्ट नवमी के दिन इस कुंड को खोला जाता है और दिव्य देवी को बाहर ले जाया जाता है और पूजा भी केवल मध्यरात्रि में ही की जाती है, तब केवल मुख्य पुजारी ही मौजूद होते है।

कालीमठ मंदिर के समीप मां ने रक्तबीज का वध किया था । उसका रक्त जमीन पर न पड़े, इसलिए महाकाली ने मुंह फैलाकर उसके रक्त को पीना शुरू किया। जिसके चलते रक्तबीज शिला नदी किनारे आज भी स्थित है ।इस शिला पर माता ने उसका सिर रखा था। रक्तबीज शीला वर्तमान समय में आज भी मंदिर के निकट नदी के किनारे स्थित है।

मंदिर में होती है मनोकामना पूर्ण

कालीमठ मंदिर के बारे में यह मान्यता है कि सच्चे मन से मांगी गयी मनोकामना या मुराद जरुर पूरी होती है। इस मंदिर में एक अखंड ज्योति निरंतर जली रहती है एवम् कालीमठ मंदिर पर रक्तशिला, मातंगशिला व चंद्रशिला स्थित हैं। कालीमठ मंदिर में दानवों का वध करने के बाद मां काली मंदिर के स्थान पर अंतर्ध्यान हो गयी, जिसके बाद से कालीमठ में मां काली की पूजा की जाती है। कालीमठ मंदिर की पुनर्स्थापना शंकराचार्य जी ने की थी।

मुराद पूरी होने पर पहले यहां बलि प्रथा दी जाती थी लेकिन अब इसमें नवरात्रों में विशेष पूजा होती है। यहीं से कालीशिल्ला के लिए भी रास्ता निकलता है। कालीमठ में तीन अलग-अलग भव्य मंदिर है जहां मां काली के साथ माता लक्ष्मी और मां सरस्वती की पूजा की जाती है। कालीमठ में सुंदर नक्काशीदार मंदिर और स्थापत्य कला के दर्शन भी होते हैं। पास ही मंदाकिनी नदी बह रही है। कालीमठ मंदिर के बारे में कई रहस्यमयी कथाए भी प्रचलित हैं।माना जाता है कि मां काली इस कुंड में समाई हुई हैं।तब से ही इस स्थान पर मां काली की पूजा की जाती है। बाद में आदि शंकराचार्य ने कालीमठ मंदिर की पुनर्स्थापना की थी। मंदिर के नजदीक ही कालीशिला भी है, जिसके बारे में कहा जाता है कि इसी शिला पर माता काली ने दानव रक्तबीज का वध किया था।

शास्त्रों अनुसार यह भी माना जाता है कि मां काली शिम्भ, निशुम्भ और रक्तबीज का वध करने के बाद भी जब शांत नहीं हुई, तो भगवान शिव मां काली के चरणों के नीचे लेट गए थे, जैसे ही मां काली ने भगवान शिवजी के सीने में पैर रखा, तो मां काली का क्रोध शांत हो गया और वह इस कुंड में अंतर्ध्यान हो गई, माना जाता है कि मां काली इस कुंड में समाई हुई है और कालीमठ मंदिर में शिवशक्ति भी स्थापित है।

कालीमठ मूल रूप से और अभी भी गांव ‘कवल्था’ के नाम से जाना जाता है।

कहा जाता है कि भारतीय इतिहास के अद्वितीय लेखक कालिदास का साधना स्थल भी यही रहा है। इसी दिव्य स्थान पर कालिदास ने मां काली को प्रसन्न कर विद्वता को प्राप्त किया था ।
पर्वतों के बीच बसे इस मंदिर में श्रद्धालुओं का जमावड़ा लगा रहा रहता है। दूर दूर से लोग माँ काली के दर्शन करने यहां पहुँचते है।

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